Thursday, November 13, 2025

प्रदूषित वातावरण और दूषित विचार

आज कल सुबह सवेरे हर एक समाचार पत्रों अथवा टेलीविजन पर लोग अपने विचार कटाक्ष और अपने उलाहना लोगों के सामाने रखते और बताते दिख रहे हैं । कईयों ने तो इस समाज को आईना दिखाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं, अपितु अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से विभिन्न विश्लेषणो के माध्यम से जनता को ज्यादा से ज्यादा गंभीर परीणाम की आशंका जताते दिख रही है।

जनता के सामने अपनी अपनी विषमता है। सरकारों को भी अपनी अपनी चिंता सता रही है। परिस्थितियां लोगों को आशंकित कर रहे हैं। शहरीकरण ने आज लोगों को किसी न किसी प्रकार से एक मुक्त और स्वावलंबी इस कदर बनाया है कि जिन्होंने गांव परिवेश छोड़कर शहरों में एक छोटा सा आशियाना बना लिया है उन्हें उसी गांव से वह लगाओ बिल्कुल भी नहीं रहा है। शहरों की सहूलियत ओने लोगों को अब गांव को हीनता की श्रेणी में रख छोड़ा है।

हम जिस प्रकार से लोग गांव की रहन सहन तथा वहां के परिदृश्य को अपने आधुनिक जीवन से अलग कर दिया है उसमें अब लोगों को बुराइयां की बुराइयां दिख पड़ती है। 

वाढते शहरीकरण और शहरों की तरफ पलायन, आज शहरों को उनके प्रसाधनों से कहीं अधिक दबाव पढ़ रहा है। शहरों को एक सुविधा मुहैया कराते कराते वही सुविधा समय के अनुसार कम जान पड़ती है। मुंबई जैसे शहरों में जहां कभी कुछ सहेलियों की व्यवस्था स्वीकार करने और उन्हें जमीन पर उतारने तक वही सहूलियत है शहर के लिए छोटी जान पड़ने लगी। 

दिल्ली जैसे महानगर में जहां आज कई करोड़ लोग स्वच्छ हवा, पानी जैसी मूलभूत जरुरत की विषम परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। वहीं अन्य शहरों की भी हालात कुछ इसी तरह की बनी हुई है। हम चुने जाने वाली सरकारों अथवा जनप्रतिनिधियों के वादों के कुछ चक्रों में पढ़कर जनता अपने आप को ठगा हुआ सा महसूस करती है। हमारे जनतंत्र की दुहाई देने वाले इस सीजन संत्र रूपी मुर्गी के पंखों को उखाड़ कर उसे जनता के बीच इस तरह से पेश करते हैं जैसे उनकी मेहनत की बदौलत यह शुभ हसी बन गई है जबकि परिस्थितियां कुछ अलग है।

हम तो परिस्थितियों के हिसाब से अपने आप को सांत्वना देने में भी कोर कसर नहीं छोड़ते कभी झंडे का रंग देखकर तो कभी व्यक्ति विशेष की जीवन शैली रहन सहन आदि को देखकर अथवा कभी हम इस पर भी अपने आपको गौरवान्वित कर लेते हैं कि किस नेता के ऊपर किसने पुलिस के कैसे चल रहे हैं। उत्तर भारत में तो चुनाव लड़ने का अथवा जनप्रतिनिधि बनने का सबसे रोचक पात्रता यह है कि वह अथवा उसके परिवार में किसी भी सदस्य के सामने बाहुबली लगा हुआ है अथवा नहीं।

अगर आप एक जनप्रतिनिधि जनता की सेवा करने की इच्छा रखते हैं तो सबसे पहले उस जनता के मुंह से यह शब्द अवश्य निकलना चाहिए कि यह एक खूंखार अथवा बाहुबली तब के से है।

लोगों का बैंक खाता आधार से जोड़ने का विकल्प भी बहुत ही बड़ा रोचक है। आपने नोटबंदी शब्द ने भी बहुत बार सुन चुके हैं ‌ यह बहुत ही उदासीन चिड़िया का नाम हो सकता है जिसे शायद अर्जुन ने वेद ने की भी कला गुरु द्रोण से सीखा और उस पर कुछ विशेष हथियारों से अपनी कला प्रदर्शनी भी किया। आज के परिपेक्ष में अर्जुन द्वारा किए गए कला प्रदर्शनी को भी लोग संसद की दृष्टि से देख सकते हैं क्योंकि चिड़िया इतनी उदासीन थी कि अपनी आंखें फाड़ कर उस विशेष हथियार के सामने कर दिया जिसे अर्जुन ने बिना किसी पात्रता के ही परिपक्वता के साथ ही छोड़ा था। 
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